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mahabharat 12.303.28: इस प्रकार आत्मा प्रकृति के द्वारा अपने स्वरूप को अनेक भागों में विभाजित कर लेती है। कभी वह स्वाहा में, कभी स्वधा में, कभी वषट्कार में और कभी नमस्कार में संलग्न रहती है।   |   mahabharat अध्याय 12.303: प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 303: प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  12.303.28 
प्रकृत्याऽऽत्मानमेवात्मा एवं प्रविभजत्युत।
स्वधाकारवषट्कारौ स्वाहाकारनमस्क्रिया:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार आत्मा प्रकृति के द्वारा अपने स्वरूप को अनेक भागों में विभाजित कर लेती है। कभी वह स्वाहा में, कभी स्वधा में, कभी वषट्कार में और कभी नमस्कार में संलग्न रहती है।
 
In this way the soul divides its own form into many parts through nature. Sometimes it is engaged in Swaha, sometimes in Swadha, sometimes in Vashatkaar and sometimes in Namaskar.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)