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mahabharat 12.303.27: अज्ञान के कारण वह सत्व, रज, तम तथा धर्म, अर्थ और काम इन तीन गुणों का अभिमान करने लगता है।   |   mahabharat अध्याय 12.303: प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 303: प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  12.303.27 
अभिमन्यत्यसम्बोधात् तथैव त्रिविधान् गुणान्।
सत्त्वं रजस्तमश्चैव धर्मार्थौ काम एव च॥ २७॥
 
 
अनुवाद
अज्ञान के कारण वह सत्व, रज, तम तथा धर्म, अर्थ और काम इन तीन गुणों का अभिमान करने लगता है।
 
Due to ignorance, he becomes proud of the threefold qualities of Sattva, Raja, Tama and Dharma, Artha and Kama.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)