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mahabharat 12.303.23: कभी वह नदियों के निर्जन तट पर, कभी निर्जन वनों में, कभी पवित्र मन्दिरों में और कभी निर्जन सरोवरों के किनारे निवास करता है॥ 23॥   |   mahabharat अध्याय 12.303: प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 303: प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  12.303.23 
पुलिनानि विविक्तानि विविक्तानि वनानि च।
देवस्थानानि पुण्यानि विविक्तानि सरांसि च॥ २३॥
 
 
अनुवाद
कभी वह नदियों के निर्जन तट पर, कभी निर्जन वनों में, कभी पवित्र मन्दिरों में और कभी निर्जन सरोवरों के किनारे निवास करता है॥ 23॥
 
Sometimes he lives on the lonely banks of rivers, sometimes in deserted forests, sometimes in holy temples and sometimes around solitary lakes.॥ 23॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)