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mahabharat 12.303.22: कभी वह नाना प्रकार के आचरण और नाना प्रकार के पाखण्ड अपनाता है। कभी वह चट्टानों की छाया में अकेला बैठता है और कभी झरनों के पास रहता है। 22॥   |   mahabharat अध्याय 12.303: प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 303: प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  12.303.22 
उपाश्रमानप्यपरान् पाषण्डान् विविधानपि।
विविक्ताश्च शिलाच्छायास्तथा प्रस्रवणानि च॥ २२॥
 
 
अनुवाद
कभी वह नाना प्रकार के आचरण और नाना प्रकार के पाखण्ड अपनाता है। कभी वह चट्टानों की छाया में अकेला बैठता है और कभी झरनों के पास रहता है। 22॥
 
Sometimes he adopts various types of practices and various types of hypocrisies. Sometimes he sits alone in the shade of rocks and sometimes he lives near waterfalls. 22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)