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mahabharat 12.303.19: कभी वह गोमूत्र खाने वाला बन जाता है, कभी सब्ज़ियाँ, फूल या ज्वार खाता है, तो कभी सिर्फ़ पानी पीकर ज़िंदा रहता है।   |   mahabharat अध्याय 12.303: प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 303: प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  12.303.19 
गोमूत्रभोजनश्चैव शाकपुष्पाद एव च।
शैवालभोजनश्चैव तथाऽऽचामेन वर्तयन्॥ १९॥
 
 
अनुवाद
कभी वह गोमूत्र खाने वाला बन जाता है, कभी सब्ज़ियाँ, फूल या ज्वार खाता है, तो कभी सिर्फ़ पानी पीकर ज़िंदा रहता है।
 
Sometimes he becomes a cow urine eater. Sometimes he eats vegetables, flowers or sorghum and sometimes he survives by merely sipping water.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)