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mahabharat 12.303.15: इनके अतिरिक्त अज्ञानी जीव नाना प्रकार के वस्त्र धारण करता है, विचित्र भोजन का स्वाद लेता है और नाना प्रकार के आभूषण धारण करता है ॥15॥   |   mahabharat अध्याय 12.303: प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 303: प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  12.303.15 
वस्त्राणि चान्यानि बहून्यभिमन्यत्यबुद्धिमान्।
भोजनानि विचित्राणि रत्नानि विविधानि च॥ १५॥
 
 
अनुवाद
इनके अतिरिक्त अज्ञानी जीव नाना प्रकार के वस्त्र धारण करता है, विचित्र भोजन का स्वाद लेता है और नाना प्रकार के आभूषण धारण करता है ॥15॥
 
Besides these, the ignorant soul also wears various kinds of clothes, tastes strange foods and wears various kinds of jewels. ॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)