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mahabharat 12.303.13: कभी वे सन या ऊन से बने वस्त्र पहनते हैं। कभी वे बाघ या सिंह की खाल से अपना शरीर ढकते हैं। कभी वे रेशमी पीले वस्त्र पहनते हैं।   |   mahabharat अध्याय 12.303: प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 303: प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  12.303.13 
शाणीवालपरीधानो व्याघ्रचर्मपरिच्छद:।
सिंहचर्मपरीधान: पट्टवासास्तथैव च॥ १३॥
 
 
अनुवाद
कभी वे सन या ऊन से बने वस्त्र पहनते हैं। कभी वे बाघ या सिंह की खाल से अपना शरीर ढकते हैं। कभी वे रेशमी पीले वस्त्र पहनते हैं।
 
Sometimes he wears clothes made of flax or wool. Sometimes he covers his body with tiger or lion skin. Sometimes he wears silken yellow clothes.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)