श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 302: वसिष्ठ और करालजनकका संवाद—क्षर और अक्षरतत्त्वका निरूपण और इनके ज्ञानसे मुक्ति  »  श्लोक 27-28
 
 
श्लोक  12.302.27-28 
श्रोत्रं त्वक् चक्षुषी जिह्वा घ्राणमेव च पञ्चमम्।
वाक् च हस्तौ च पादौ च पायुर्मेढ्रं तथैव च॥ २७॥
बुद्धीन्द्रियाणि चैतानि तथा कर्मेन्द्रियाणि च।
सम्भूतानीह युगपन्मनसा सह पार्थिव॥ २८॥
 
 
अनुवाद
इस स्थूल अवस्था के अन्तर्गत नेत्र, कान, नाक, त्वचा और जिह्वा ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं तथा वाणी, हाथ, पैर, गुदा और लिंग ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं। पृथ्वीनाथ! मन सहित ये सब एक साथ उत्पन्न होते हैं। 27-28॥
 
Under this physical stage, eyes, ears, nose, skin and tongue are the five sense organs and speech, hands, feet, anus and penis are the five action organs. Prithvinath! All these, including the mind, originate simultaneously. 27-28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)