श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 302: वसिष्ठ और करालजनकका संवाद—क्षर और अक्षरतत्त्वका निरूपण और इनके ज्ञानसे मुक्ति  »  श्लोक 19-20
 
 
श्लोक  12.302.19-20 
सांख्ये च पठॺते शास्त्रे नामभिर्बहुधात्मक:।
विचित्ररूपो विश्वात्मा एकाक्षर इति स्मृत:॥ १९॥
वृतं नैकात्मकं येन कृतं त्रैलोक्यमात्मना।
तथैव बहुरूपत्वाद् विश्वरूप इति स्मृत:॥ २०॥
 
 
अनुवाद
अनेक नाम और रूपों वाले इन हिरण्यगर्भ ब्रह्म का वर्णन सांख्यशास्त्र में भी किया गया है। इन्हें विचित्र रूप वाला, विश्वात्मा और एकाक्षर कहा गया है। इन्होंने ही इस त्रिलोकी को अनेक रूपों से उत्पन्न किया है और स्वयं इसमें व्याप्त हैं। इस प्रकार अनेक रूप धारण करने के कारण इन्हें ब्रह्माण्ड का स्वरूप माना गया है॥19-20॥
 
This Hiranyagarbha Brahma, who has many names and forms, is also described in Sankhya Shastra. He is said to have a strange form, to be the universal soul and to be one letter. He is the one who created this Triloki with many forms and has pervaded it himself. Thus, due to assuming many forms, he is considered to be the form of the universe.॥19-20॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)