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mahabharat 12.301.98: हे भरतनन्दन! इस प्रकार मुक्तात्मा का आत्मा परमात्मा में लीन हो जाता है, परन्तु प्रारब्धवश जब तक शरीर रहता है, तब तक उसके मन और इन्द्रियाँ रहती हैं और गुरु की आज्ञा का पालन करने वाले शिष्यों की भाँति वे समयानुसार यहाँ आते-जाते रहते हैं॥ 98॥   |   mahabharat अध्याय 12.301: सांख्ययोगके अनुसार साधन और उसके फलका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 301: सांख्ययोगके अनुसार साधन और उसके फलका वर्णन  »  श्लोक 98
 
 
श्लोक  12.301.98 
शिष्टं तत्र मनस्तात इन्द्रियाणि च भारत।
आगच्छन्ति यथाकालं गुरो: संदेशकारिण:॥ ९८॥
 
 
अनुवाद
हे भरतनन्दन! इस प्रकार मुक्तात्मा का आत्मा परमात्मा में लीन हो जाता है, परन्तु प्रारब्धवश जब तक शरीर रहता है, तब तक उसके मन और इन्द्रियाँ रहती हैं और गुरु की आज्ञा का पालन करने वाले शिष्यों की भाँति वे समयानुसार यहाँ आते-जाते रहते हैं॥ 98॥
 
O Bharatanandan! In this way the soul of a liberated soul merges with the Supreme Soul, but due to destiny as long as the body exists, his mind and senses remain and like disciples who follow the orders of their Guru, they go and come here according to time.॥ 98॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)