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mahabharat 12.301.87: जैसे समुद्र में उठने वाला झाग लुप्त हो जाता है, वैसे ही आत्मा से अलग होकर मनुष्य की जड़ इन्द्रियाँ लकड़ी या दीवार के समान प्रकृति में विलीन हो जाती हैं; इसमें कोई संदेह नहीं है ॥ 87॥   |   mahabharat अध्याय 12.301: सांख्ययोगके अनुसार साधन और उसके फलका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 301: सांख्ययोगके अनुसार साधन और उसके फलका वर्णन  »  श्लोक 87
 
 
श्लोक  12.301.87 
आत्मना विप्रहीणानि काष्ठकुडॺसमानि तु।
विनश्यन्ति न संदेह: फेना इव महार्णवे॥ ८७॥
 
 
अनुवाद
जैसे समुद्र में उठने वाला झाग लुप्त हो जाता है, वैसे ही आत्मा से अलग होकर मनुष्य की जड़ इन्द्रियाँ लकड़ी या दीवार के समान प्रकृति में विलीन हो जाती हैं; इसमें कोई संदेह नहीं है ॥ 87॥
 
Just as the foam rising in the ocean vanishes, so too, when separated from the soul, the inert senses of man, like a piece of wood or a wall, merge into Nature; there is no doubt about this. ॥ 87॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)