श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 300: सांख्य और योगका अन्तर बतलाते हुए योगमार्गके स्वरूप साधन,फल और प्रभावका वर्णन  »  श्लोक 62
 
 
श्लोक  12.300.62 
कथा च येयं नृपते प्रसक्ता
देवे महावीर्यमतौ शुभेयम्।
योगी स सर्वानभिभूय मर्त्यान्
नारायणात्मा कुरुते महात्मा॥ ६२॥
 
 
अनुवाद
नरेश्वर! मैंने तुम्हें महान बल और बुद्धि से युक्त भगवान् के विषय में यह मंगलमय वचन सुनाया है। योगसिद्ध महात्मा पुरुष समस्त मनुष्यों से ऊपर उठकर नारायणस्वरूप हो जाता है और केवल अपने संकल्प मात्र से सृष्टि करने लगता है। 62॥
 
Nareshwar! I have narrated this auspicious talk to you related to God who is endowed with great strength and wisdom. A Yogsiddha Mahatma man rises above all human beings and becomes the form of Narayana and starts creating with just his thoughts. 62॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि योगविधौ त्रिशततमोऽध्याय:॥ ३००॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें योगविधिविषयक तीन सौवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३००॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)