श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 300: सांख्य और योगका अन्तर बतलाते हुए योगमार्गके स्वरूप साधन,फल और प्रभावका वर्णन  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  12.300.54 
सुस्थेयं क्षुरधारासु निशितासु महीपते।
धारणासु तु योगस्य दु:स्थेयमकृतात्मभि:॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
हे पृथ्वीवासी! छुरे की धार पर तो मनुष्य सुखपूर्वक खड़ा रह सकता है; परन्तु जिनका मन शुद्ध नहीं है, उनके लिए योग के सिद्धान्त पर स्थिर रहना अत्यन्त कठिन है ॥ 54॥
 
O Earthling! One can comfortably stand on the sharp edge of a knife; but it is extremely difficult for people whose mind is not pure to remain steadfast in the principles of Yoga. ॥ 54॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)