श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 300: सांख्य और योगका अन्तर बतलाते हुए योगमार्गके स्वरूप साधन,फल और प्रभावका वर्णन  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  12.300.50 
दुर्गस्त्वेष मत: पन्था ब्राह्मणानां विपश्चिताम्।
य: कश्चिद् व्रजति ह्यस्मिन् क्षेमेण भरतर्षभ॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
हे भारतश्रेष्ठ! विद्वान ब्राह्मणों ने इस योगमार्ग को दुर्गम माना है। कोई विरला व्यक्ति ही इस मार्ग को कुशलतापूर्वक प्रशस्त कर सकता है। 50॥
 
Bharatshrestha! Learned Brahmins have considered this path of yoga inaccessible. Only a very rare person can pave this path efficiently. 50॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)