श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 300: सांख्य और योगका अन्तर बतलाते हुए योगमार्गके स्वरूप साधन,फल और प्रभावका वर्णन  »  श्लोक 36-37
 
 
श्लोक  12.300.36-37 
सारथिश्च यथा युक्त्वा सदश्वान् सुसमाहित:।
देशमिष्टं नयत्याशु धन्विनं पुरुषर्षभ॥ ३६॥
तथैव नृपते योगी धारणासु समाहित:।
प्राप्नोत्याशु परं स्थानं लक्षं मुक्त इवाशुग:॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
हे महापुरुष! राजन! जैसे एक सावधान सारथी अच्छे घोड़ों को रथ में जोतकर धनुर्धर को शीघ्र ही इच्छित स्थान पर पहुँचा देता है, वैसे ही धारणा में एकाग्रचित्त योगी लक्ष्य की ओर छोड़े गए बाण के समान शीघ्र ही परमपद को प्राप्त कर लेता है।
 
O great man! King! Just as a very careful charioteer, after harnessing good horses to the chariot, quickly takes the archer to the desired destination, similarly, a Yogi, who is focused on Dharana, quickly attains the supreme state like an arrow shot towards the target.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)