श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 30: महर्षि नारद और पर्वतका उपाख्यान  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  12.30.41 
तां पर्वतस्ततो दृष्ट्वा प्रद्रवन्तीमनिन्दिताम्।
अब्रवीत् तव भर्तैष नात्र कार्या विचारणा॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
उस पतिव्रता एवं गुणवती राजकुमारी को भागते हुए देखकर पर्वत ने उससे कहा - 'देवि! यह वास्तव में तुम्हारा पति है। इस विषय में अन्यथा विचार करने की कोई आवश्यकता नहीं है।' ॥41॥
 
Seeing that chaste and virtuous princess running away, the mountain said to her - 'Devi! This is indeed your husband. There is no need to think otherwise in this matter.' ॥ 41॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)