श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 30: महर्षि नारद और पर्वतका उपाख्यान  »  श्लोक 37-39h
 
 
श्लोक  12.30.37-39h 
त्वयाहं प्रथमं शप्तो वानरस्त्वं भविष्यसि॥ ३७॥
इत्युक्तेन मया पश्चाच्छप्तस्त्वमपि मत्सरात् ।
अद्यप्रभृति वै वासं स्वर्गे नावाप्स्यसीति ह॥ ३८॥
तव नैतद्धि विसदृशं पुत्रस्थाने हि मे भवान्।
 
 
अनुवाद
‘पुत्र! पहले तो तुमने मुझे शाप दिया था कि तुम बन्दर हो जाओगे। तुम्हारे ऐसा कहने के बाद मैंने भी ईर्ष्यावश तुम्हें शाप दे दिया, जिसके कारण तुम आज तक स्वर्ग नहीं जा सके। यह तुम्हारे लिए उचित नहीं था; क्योंकि तुम मेरे पुत्र के स्थान पर हो।’ ॥37-38 1/2॥
 
‘Son! Earlier you had cursed me that you will become a monkey. After you said this, I too cursed you out of jealousy, due to which you could not go to heaven till today. This was not a suitable act for you; because you are in the place of my son.’ ॥ 37-38 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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