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mahabharat 12.3.7: रक्त चूसने वाला कीड़ा कर्ण की जांघ तक पहुंच गया और उसमें छेद कर दिया; लेकिन कर्ण अपने गुरु के जाग जाने के भय से न तो उसे फेंक सका और न ही मार सका।   |   mahabharat अध्याय 12.3: कर्णको ब्रह्मास्त्रकी प्राप्ति और परशुरामजीका शाप   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 3: कर्णको ब्रह्मास्त्रकी प्राप्ति और परशुरामजीका शाप  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  12.3.7 
स तस्योरुमथासाद्य बिभेद रुधिराशन:।
न चैनमशकत् क्षेप्तुं हन्तुं वापि गुरोर्भयात्॥ ७॥
 
 
अनुवाद
रक्त चूसने वाला कीड़ा कर्ण की जांघ तक पहुंच गया और उसमें छेद कर दिया; लेकिन कर्ण अपने गुरु के जाग जाने के भय से न तो उसे फेंक सका और न ही मार सका।
 
The blood-sucking insect reached Karna's thigh and pierced it; but Karna could neither throw it away nor kill it due to the fear of his Guru waking up.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)