श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 3: कर्णको ब्रह्मास्त्रकी प्राप्ति और परशुरामजीका शाप  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  12.3.20 
सोऽहं भृगो: सुदयितां भार्यामपहरं बलात्।
महर्षेरभिशापेन कृमिभूतोऽपतं भुवि॥ २०॥
 
 
अनुवाद
एक दिन मैंने भृगु की प्रिय पत्नी का बलपूर्वक हरण कर लिया। इससे ऋषि ने मुझे शाप दे दिया और मैं कीड़ा बनकर इस पृथ्वी पर गिर पड़ा।
 
‘One day I forcefully abducted Bhrigu's beloved wife. Due to this the sage cursed me and I became a worm and fell on this earth.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)