श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 3: कर्णको ब्रह्मास्त्रकी प्राप्ति और परशुरामजीका शाप  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  12.3.14 
स दृष्टमात्रो रामेण कृमि: प्राणानवासृजत्।
तस्मिन्नेवासृजि क्लिन्नस्तदद्भुतमिवाभवत्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
परशुरामजी की दृष्टि पड़ते ही रक्त से लथपथ उस कीड़े ने प्राण त्याग दिए। यह आश्चर्य की बात थी ॥14॥
 
As soon as Parasurama looked at it, the insect soaked in blood gave up its life. It was an astonishing thing. ॥14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)