श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 3: कर्णको ब्रह्मास्त्रकी प्राप्ति और परशुरामजीका शाप  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  12.3.1 
नारद उवाच
कर्णस्य बाहुवीर्येण प्रणयेन दमेन च।
तुतोष भृगुशार्दूलो गुरुशुश्रूषया तथा॥ १॥
 
 
अनुवाद
नारदजी कहते हैं- राजन! भृगुश्रेष्ठ परशुरामजी कर्ण के बाहुबल, प्रेम, इन्द्रिय-संयम और गुरु-सेवा से अत्यन्त संतुष्ट हुए॥1॥
 
Naradji says- Rajan! Bhrigu's best Parashuramji was very satisfied with Karna's muscular strength, love, control of senses and service to his Guru. 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)