युधिष्ठिर! मैंने तुमसे हंस और लक्ष्य के बीच का संवाद इस प्रकार कहा है। यह शरीर कर्मों का मूल है और शुभ संकल्प को सत्य कहा गया है। ॥45॥
Yudhishthira! I have thus described to you the conversation between the swan and the goals. This body is the source of actions and good will is called truth. ॥ 45॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि हंसगीतासमाप्तौ नवनवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २९९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें हंसगीताकी समाप्ति विषयक दो सौ निन्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २९९॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ४७ श्लोक हैं)
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥