श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 299: हंसगीता-हंसरूपधारी ब्रह्माका साध्यगणोंको उपदेश  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  12.299.43 
साध्या ऊचु:
किं ब्राह्मणानां देवत्वं किं च साधुत्वमुच्यते।
असाधुत्वं च किं तेषां किमेषां मानुषं मतम्॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
ऋषियों ने पूछा - हंस ! ब्राह्मणों का देवत्व क्या है ? उनका साधुत्व क्या माना जाता है ? उनका तप और मनुष्यत्व क्या माना जाता है ?॥ 43॥
 
The sages asked - Hans! What is the divinity of the Brahmins? What is considered to be their saintliness? What is considered to be their asceticism and humanity?॥ 43॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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