श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 299: हंसगीता-हंसरूपधारी ब्रह्माका साध्यगणोंको उपदेश  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  12.299.34 
सदा देवा: साधुभि: संवदन्ते
न मानुषं विषयं यान्ति द्रष्टुम्।
नेन्दु: सम: स्यादसमो हि वायु-
रुच्चावचं विषयं य: स वेद॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
देवता सदैव सत्पुरुषों के साथ रहते हैं और उनसे वार्तालाप करते हैं; इसीलिए वे मनुष्यों के क्षणिक सुखों की ओर देखते भी नहीं। जो मनुष्य नाना प्रकार के पदार्थों के नाशवान स्वभाव को भली-भाँति जानता है, उसकी तुलना न तो चन्द्रमा से की जा सकती है और न वायु से।
 
The gods always keep company with the good men and converse with them; that is why they do not even look at the temporary pleasures of the humans. One who is well aware of the perishable nature of various objects, can neither be compared to the moon nor the wind.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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