श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 299: हंसगीता-हंसरूपधारी ब्रह्माका साध्यगणोंको उपदेश  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  12.299.32 
यादृशै: संनिवसति यादृशांश्चोपसेवते।
यादृगिच्छेच्च भवितुं तादृग् भवति पूरुष:॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य जैसा है, जैसा लोगों के साथ रहता है, जैसा लोगों का सेवन करता है, जैसा बनना चाहता है, वैसा ही बन जाता है ॥32॥
 
A man becomes what he is, what kind of people he lives with, what kind of people he consumes, and what kind of being he wants to be. ॥ 32॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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