श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 299: हंसगीता-हंसरूपधारी ब्रह्माका साध्यगणोंको उपदेश  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  12.299.27 
यत् क्रोधनो यजति यद् ददाति
यद् वा तपस्तप्यति यज्जुहोति।
वैवस्वतस्तद्धरतेऽस्य सर्वं
मोघ: श्रमो भवति हि क्रोधनस्य॥ २७॥
 
 
अनुवाद
क्रोधी मनुष्य जो भी यज्ञ, दान, तप या हवन करता है, उसके समस्त कर्मों का फल यमराज ले जाते हैं। क्रोधी मनुष्य के सारे प्रयास व्यर्थ हो जाते हैं॥27॥
 
Whatever sacrifice, charity, penance or havan an angry man performs, the fruits of all his deeds are taken away by Yamaraja. All the efforts of an angry man go in vain.॥ 27॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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