श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 299: हंसगीता-हंसरूपधारी ब्रह्माका साध्यगणोंको उपदेश  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  12.299.17 
यो नात्युक्त: प्राह रूक्षं प्रियं वा
यो वा हतो न प्रतिहन्ति धैर्यात्।
पापं च यो नेच्छति तस्य हन्तु-
स्तस्येह देवा: स्पृहयन्ति नित्यम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
जो दूसरों के द्वारा कटु बातें कहे जाने पर भी उनसे न तो कठोर कहता है और न मधुर, तथा किसी के द्वारा दुःख पाए जाने पर भी धैर्य के कारण दुःख देने वाले को न तो मारता है और न ही उसका अनिष्ट चाहता है, उस महात्मा से मिलने के लिए देवतागण सदैव उत्सुक रहते हैं। ॥17॥
 
The Gods are always eager to meet that great soul who, even when others say bitter things to him, does not say anything harsh or sweet to them, and even after being hurt by someone, due to his patience neither kills the one who hurt him nor wishes ill for him. ॥17॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas