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mahabharat 12.298.28: जैसे व्यापारी व्यापार के लिए समुद्र मार्ग से जाता है और अपनी पूँजी के अनुसार धन कमाता है, वैसे ही संसार रूपी समुद्र में व्यापार करने वाला प्राणी अपने कर्म और ज्ञान के अनुसार उन्नति प्राप्त करता है ॥28॥   |   mahabharat अध्याय 12.298: पराशरगीताका उपसंहार—राजा जनकके विविध प्रश्नोंका उत्तर   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 298: पराशरगीताका उपसंहार—राजा जनकके विविध प्रश्नोंका उत्तर  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  12.298.28 
वणिग् यथा समुद्राद् वै यथार्थं लभते धनम्।
तथा मर्त्यार्णवे जन्तो: कर्मविज्ञानतो गति:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
जैसे व्यापारी व्यापार के लिए समुद्र मार्ग से जाता है और अपनी पूँजी के अनुसार धन कमाता है, वैसे ही संसार रूपी समुद्र में व्यापार करने वाला प्राणी अपने कर्म और ज्ञान के अनुसार उन्नति प्राप्त करता है ॥28॥
 
Just as a trader goes to sea route for business and earns money according to his capital, similarly a living being doing business in the ocean of the world attains progress according to his deeds and knowledge. ॥28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)