श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 296: पराशरगीता—वर्णविशेषकी उत्पत्तिका रहस्य, तपोबलसे उत्कृष्ट वर्णकी प्राप्ति, विभिन्न वर्णोंके विशेष और सामान्य धर्म, सत्कर्मकी श्रेष्ठता तथा हिंसारहित धर्मका वर्णन  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  12.296.31 
जनक उवाच
किं कर्म दूषयत्येनमथो जातिर्महामुने।
संदेहो मे समुत्पन्नस्तन्मे व्याख्यातुमर्हसि॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
जनक ने पूछा, "महामुनि! मनुष्य को भ्रष्ट करने वाले उसके कर्म हैं या उसकी जाति? यह शंका मेरे मन में उत्पन्न हुई है। कृपया इसका स्पष्टीकरण करें।" 31.
 
Janaka asked, "Mahamuni! Is it his deeds that corrupt a man or his caste? This doubt has arisen in my mind. Please explain it." 31.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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