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mahabharat 12.296.17-18: पृथ्वीनाथ! पहले तो केवल चार मूल गोत्र ही प्रकट हुए - अंगिरा, कश्यप, वशिष्ठ और भृगु। बाद में अपने कर्मों के अनुसार अन्य गोत्र उत्पन्न हुए। उन गोत्र-संस्थापक महर्षियों की तपस्या के कारण वे गोत्र और उनके नाम साधु समुदाय में सुप्रसिद्ध और आदरणीय हो गए हैं॥17-18॥   |   mahabharat अध्याय 12.296: पराशरगीता—वर्णविशेषकी उत्पत्तिका रहस्य, तपोबलसे उत्कृष्ट वर्णकी प्राप्ति, विभिन्न वर्णोंके विशेष और सामान्य धर्म, सत्कर्मकी श्रेष्ठता तथा हिंसारहित धर्मका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.296.17-18 
मूलगोत्राणि चत्वारि समुत्पन्नानि पार्थिव।
अङ्गिरा: कश्यपश्चैव वसिष्ठो भृगुरेव च॥ १७॥
कर्मतोऽन्यानि गोत्राणि समुत्पन्नानि पार्थिव।
नामधेयानि तपसा तानि च ग्रहणं सताम्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
पृथ्वीनाथ! पहले तो केवल चार मूल गोत्र ही प्रकट हुए - अंगिरा, कश्यप, वशिष्ठ और भृगु। बाद में अपने कर्मों के अनुसार अन्य गोत्र उत्पन्न हुए। उन गोत्र-संस्थापक महर्षियों की तपस्या के कारण वे गोत्र और उनके नाम साधु समुदाय में सुप्रसिद्ध और आदरणीय हो गए हैं॥17-18॥
 
Prithvinath! First, only the four original gotras appeared - Angira, Kashyap, Vasishtha and Bhrigu. Other gotras were born later according to their deeds. Those gotras and their names have become well known and respected in the sadhu community due to the penance of those gotra-founder Maharishis.॥17-18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)