श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 296: पराशरगीता—वर्णविशेषकी उत्पत्तिका रहस्य, तपोबलसे उत्कृष्ट वर्णकी प्राप्ति, विभिन्न वर्णोंके विशेष और सामान्य धर्म, सत्कर्मकी श्रेष्ठता तथा हिंसारहित धर्मका वर्णन  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  12.296.11 
यत्र तत्र कथं जाता: स्वयोनिं मुनयो गता:।
शुद्धयोनौ समुत्पन्ना वियोनौ च तथा परे॥ ११॥
 
 
अनुवाद
भिन्न-भिन्न स्थानों में उत्पन्न हुए अर्थात् शुद्ध योनियों में उत्पन्न हुए और विपरीत योनियों में उत्पन्न हुए ऋषि-मुनि किस प्रकार ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुए? ॥11॥
 
How did the sages and saints, who were born in different places, i.e. those who were born in pure wombs and those who were born in opposite wombs, attain brahminhood? ॥11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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