श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 295: पराशरगीता—विषयासक्त मनुष्यका पतन, तपोबलकी श्रेष्ठता तथा दृढ़तापूर्वक स्वधर्मपालनका आदेश  »  श्लोक 36-37
 
 
श्लोक  12.295.36-37 
मानिनां कुलजातानां नित्यं शास्त्रार्थचक्षुषाम्।
क्रियाधर्मविमुक्तानामशक्त्या संवृतात्मनाम्॥ ३६॥
क्रियमाणं यदा कर्म नाशं गच्छति मानुषम्।
तेषां नान्यदृते लोके तपस: कर्म विद्यते॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
जब श्रेष्ठ कुलों में उत्पन्न, प्रतिष्ठित और शास्त्रों के अर्थ को जानने वाले मनुष्यों के तथा असमर्थता के कारण कर्तव्य और धर्म से रहित तथा आत्मज्ञान से अनभिज्ञ मनुष्यों के भी सांसारिक कर्म नष्ट हो जाते हैं, तब निष्कर्ष यह निकलता है कि उनके लिए संसार में तप के अतिरिक्त और कोई अच्छा कर्म नहीं है ॥36-37॥
 
When the worldly deeds of those born in noble families, respected and those who know the meaning of scriptures, and also of those who are devoid of duty and religion due to their inability and are ignorant of the Self, get destroyed, then the conclusion is that for them there is no other good deed in the world except austerity. ॥36-37॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)