श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 292: पराशरगीता—धर्मोपार्जित धनकी श्रेष्ठता, अतिथि-सत्कारका महत्त्व, पाँच प्रकारके ऋणोंसे छूटनेकी विधि, भगवत्स्तवनकी महिमा एवं सदाचार तथा गुरुजनोंकी सेवासे महान् लाभ  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  12.292.9 
देवतातिथिभृत्येभ्य: पितृभ्यश्चात्मनस्तथा।
ऋणवान् जायते मर्त्यस्तस्मादनृणतां व्रजेत्॥ ९॥
 
 
अनुवाद
प्रत्येक मनुष्य जन्म से ही देवताओं, अतिथियों, कुटुम्बियों, पितरों और यहाँ तक कि स्वयं अपने प्रति भी ऋणी होता है; अतः उसे उस ऋण से मुक्त होने का प्रयत्न करना चाहिए॥9॥
 
Every human being is born indebted to gods, guests, family members, forefathers and even to himself; hence he must make efforts to free himself from that debt.॥ 9॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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