श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 292: पराशरगीता—धर्मोपार्जित धनकी श्रेष्ठता, अतिथि-सत्कारका महत्त्व, पाँच प्रकारके ऋणोंसे छूटनेकी विधि, भगवत्स्तवनकी महिमा एवं सदाचार तथा गुरुजनोंकी सेवासे महान् लाभ  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  12.292.7 
रन्तिदेवेन लोकेष्टा सिद्धि: प्राप्ता महात्मना।
फलपत्रैरथो मूलैर्मुनीनर्चितवांश्च स:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
महाबली राजा रन्तिदेव ने फल, मूल और पत्तों से ऋषियों और मुनियों का पूजन किया, जिससे उन्हें वह सिद्धि प्राप्त हुई जिसकी सभी को इच्छा होती है॥7॥
 
The great king Rantidev worshipped the sages and saints with fruits, roots and leaves. This gave him the siddhi (attainment) that everyone desires.॥ 7॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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