श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 292: पराशरगीता—धर्मोपार्जित धनकी श्रेष्ठता, अतिथि-सत्कारका महत्त्व, पाँच प्रकारके ऋणोंसे छूटनेकी विधि, भगवत्स्तवनकी महिमा एवं सदाचार तथा गुरुजनोंकी सेवासे महान् लाभ  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  12.292.4 
न्यायागतं धनं चैव न्यायेनैव विवर्धितम्।
संरक्ष्यं यत्नमास्थाय धर्मार्थमिति निश्चय:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
न्यायपूर्वक अर्जित और बढ़ा हुआ धन धर्म के प्रयोजन के लिए सावधानी से सुरक्षित रखना चाहिए। यही धर्मशास्त्रों का निर्णय है ॥4॥
 
The wealth which is acquired and increased by justice should be carefully preserved for the purpose of religion. This is the decision of the religious scriptures. ॥ 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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