श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 292: पराशरगीता—धर्मोपार्जित धनकी श्रेष्ठता, अतिथि-सत्कारका महत्त्व, पाँच प्रकारके ऋणोंसे छूटनेकी विधि, भगवत्स्तवनकी महिमा एवं सदाचार तथा गुरुजनोंकी सेवासे महान् लाभ  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  12.292.23 
मानं त्यक्त्वा यो नरो वृद्धसेवी
विद्वान् क्लीब: पश्यति प्रीतियोगात् ।
दाक्ष्येण हीनो धर्मयुक्तो नदान्तो
लोकेऽस्मिन् वै पूज्यते सद्भिरार्य:॥ २३॥
 
 
अनुवाद
जो अभिमान त्यागकर वृद्धों की सेवा करता है, विद्वान् है और विषय-भोगों से विरक्त है, सब पर प्रेम की दृष्टि रखता है, मन में कोई कपट नहीं रखता, धर्म में लगा रहता है और दूसरों पर अत्याचार या हानि नहीं करता, वह इस संसार में श्रेष्ठ पुरुष है और सत्पुरुषों द्वारा भी उसका आदर किया जाता है ॥23॥
 
He who, abandoning pride, serves the elderly, is learned and detached from sensual pleasures and looks at everyone with love, does not keep any cunning in his mind and remains engaged in religion and does not oppress or harm others, is the best man in this world and is respected by the good men as well. ॥23॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि पराशरगीतायां द्विनवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २९२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें पराशरगीताविषयक दो सौ बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २९२॥

 
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas