श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 292: पराशरगीता—धर्मोपार्जित धनकी श्रेष्ठता, अतिथि-सत्कारका महत्त्व, पाँच प्रकारके ऋणोंसे छूटनेकी विधि, भगवत्स्तवनकी महिमा एवं सदाचार तथा गुरुजनोंकी सेवासे महान् लाभ  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  12.292.21 
स चाप्यग्न्याहितो विप्र: क्रिया यस्य न हीयते।
श्रेयो ह्यनाहिताग्नित्वमग्निहोत्रं न निष्क्रियम्॥ २१॥
 
 
अनुवाद
जिस ब्राह्मण का सदाचार और सत्कर्म कभी नष्ट नहीं होते, वह अग्निहोत्री है (भले ही वह अग्निहोत्र न करता हो)। यदि सदाचार का उचित पालन किया जाए, तो अग्निहोत्र न भी हो तो अच्छा है; किन्तु सदाचार का परित्याग करके केवल अग्निहोत्र करना कभी भी लाभदायक नहीं होता।
 
A Brahmin whose good conduct and good deeds never fade away is an Agnihotri (even if he does not perform Agnihotra). It is good if Agnihotra cannot be performed if good conduct is followed properly; but it is never beneficial to abandon good conduct and only perform Agnihotra.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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