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mahabharat 12.292.20: राजेन्द्र! जो प्रतिदिन अग्निहोत्र करता है, वह पुण्यात्मा है और पुण्यकर्म करने वालों में श्रेष्ठ है। हे प्रभु! सम्पूर्ण वेद इन तीन अग्नियों - दक्षिण, आहवनीय और गार्हपत्य - में स्थित हैं। 20॥   |   mahabharat अध्याय 12.292: पराशरगीता—धर्मोपार्जित धनकी श्रेष्ठता, अतिथि-सत्कारका महत्त्व, पाँच प्रकारके ऋणोंसे छूटनेकी विधि, भगवत्स्तवनकी महिमा एवं सदाचार तथा गुरुजनोंकी सेवासे महान् लाभ   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 292: पराशरगीता—धर्मोपार्जित धनकी श्रेष्ठता, अतिथि-सत्कारका महत्त्व, पाँच प्रकारके ऋणोंसे छूटनेकी विधि, भगवत्स्तवनकी महिमा एवं सदाचार तथा गुरुजनोंकी सेवासे महान् लाभ  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  12.292.20 
आहिताग्निर्हि धर्मात्मा य: स पुण्यकृदुत्तम:।
वेदा हि सर्वे राजेन्द्र स्थितास्त्रिष्वग्निषु प्रभो॥ २०॥
 
 
अनुवाद
राजेन्द्र! जो प्रतिदिन अग्निहोत्र करता है, वह पुण्यात्मा है और पुण्यकर्म करने वालों में श्रेष्ठ है। हे प्रभु! सम्पूर्ण वेद इन तीन अग्नियों - दक्षिण, आहवनीय और गार्हपत्य - में स्थित हैं। 20॥
 
Rajendra! The one who performs Agnihotra daily is a virtuous soul and is the best among those who perform virtuous deeds. Lord! The entire Vedas are situated in these three fires - Dakshin, Ahavaniya and Garhapatya. 20॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)