श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 292: पराशरगीता—धर्मोपार्जित धनकी श्रेष्ठता, अतिथि-सत्कारका महत्त्व, पाँच प्रकारके ऋणोंसे छूटनेकी विधि, भगवत्स्तवनकी महिमा एवं सदाचार तथा गुरुजनोंकी सेवासे महान् लाभ  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  12.292.2 
गौरवेण परित्यक्तं नि:स्नेहं परिवर्जयेत्।
सोदर्यं भ्रातरमपि किमुतान्यं पृथग्जनम्॥ २॥
 
 
अनुवाद
यदि अपना भाई भी अपना अच्छा स्वभाव और स्नेह त्याग दे, तो लोग उसे त्याग देते हैं; फिर अन्य साधारण व्यक्ति का क्या?
 
Even if one's own brother gives up his good nature and affection, people abandon him; then what about any other ordinary person?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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