श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 292: पराशरगीता—धर्मोपार्जित धनकी श्रेष्ठता, अतिथि-सत्कारका महत्त्व, पाँच प्रकारके ऋणोंसे छूटनेकी विधि, भगवत्स्तवनकी महिमा एवं सदाचार तथा गुरुजनोंकी सेवासे महान् लाभ  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  12.292.11 
वाचा शेषावहार्येण पालनेनात्मनोऽपि च।
यथावद् भृत्यवर्गस्य चिकीर्षेत् कर्म आदित:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
इसी प्रकार वेदों का पठन-पाठन, श्रवण और मनन करने, यज्ञ से बचे हुए अन्न को खाने तथा प्राणियों की रक्षा करने से मनुष्य अपने ऋण से मुक्त हो जाता है। आश्रित स्वजनों के पालन-पोषण की व्यवस्था प्रारम्भ से ही करनी चाहिए। इससे वे भी ऋण से मुक्त हो जाते हैं। 11॥
 
Similarly, by reading, listening to and meditating on the Vedas, eating the food left over from sacrifices and protecting living beings, man becomes free from his debts. Arrangements should be made from the very beginning for the upbringing of dependent relatives. This also frees them from debt. 11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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