श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 292: पराशरगीता—धर्मोपार्जित धनकी श्रेष्ठता, अतिथि-सत्कारका महत्त्व, पाँच प्रकारके ऋणोंसे छूटनेकी विधि, भगवत्स्तवनकी महिमा एवं सदाचार तथा गुरुजनोंकी सेवासे महान् लाभ  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  12.292.10 
स्वाध्यायेन महर्षिभ्यो देवेभ्यो यज्ञकर्मणा।
पितृभ्य: श्राद्धदानेन नृणामभ्यर्चनेन च॥ १०॥
 
 
अनुवाद
वेद-शास्त्रों का स्वाध्याय करने से ऋषियों के ऋण से, यज्ञ करने से देवताओं के ऋण से, श्राद्ध और दान करने से पितरों के ऋण से तथा अतिथि सत्कार और सेवा आदि से अतिथि ऋण से मुक्ति मिलती है। 10॥
 
By self-studying the Vedas and scriptures, one gets relief from the debt of the sages, of the gods by performing yagya, of the ancestors by doing Shraddha and donations and of the guests by hospitality and service etc. 10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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