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श्लोक 12.290.4  |
किं श्रेय: सर्वभूतानामस्मिंल्लोके परत्र च।
यद् भवेत् प्रतिपत्तव्यं तद् भवान् प्रब्रवीतु मे॥ ४॥ |
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| अनुवाद |
| ‘मुनि! वह कौन सी वस्तु है जो इस लोक और परलोक में समस्त प्राणियों के लिए हितकर और जानने योग्य है? कृपया मुझे वह बताइए।’॥4॥ |
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| ‘Muni! What is that thing which is beneficial and worth knowing for all beings in this world and the next? Please tell me that.’॥ 4॥ |
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