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mahabharat 12.290.24: जो कार्य मनुष्य दूसरों के लिए निन्दा करता है, उसे स्वयं नहीं करना चाहिए। जो दूसरों की निन्दा करता है; वह स्वयं भी उन्हीं निंदनीय कार्यों में संलग्न रहता है और उपहास का पात्र बनता है।   |   mahabharat अध्याय 12.290: पराशरगीताका आरम्भ—पराशर मुनिका राजा जनकको कल्याणकी प्राप्तिके साधनका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.290.24 
परेषां यदसूयेत न तत् कुर्यात् स्वयं नर:।
यो ह्यसूयुस्तथायुक्त: सोऽवहासं नियच्छति॥ २४॥
 
 
अनुवाद
जो कार्य मनुष्य दूसरों के लिए निन्दा करता है, उसे स्वयं नहीं करना चाहिए। जो दूसरों की निन्दा करता है; वह स्वयं भी उन्हीं निंदनीय कार्यों में संलग्न रहता है और उपहास का पात्र बनता है।
 
Whatever action a person criticizes for others, he should not do it himself. One who criticizes others; But he himself continues to engage in the same condemnable acts and becomes an object of ridicule.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)