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mahabharat 12.290.21: विद्वान् पुरुष को जीवन भर पाप या पुण्य में आसक्त नहीं होना चाहिए तथा अपने मन को भगवान् में एकाग्र करने का प्रयत्न करना चाहिए । 21॥   |   mahabharat अध्याय 12.290: पराशरगीताका आरम्भ—पराशर मुनिका राजा जनकको कल्याणकी प्राप्तिके साधनका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.290.21 
दुष्कृते सुकृते चापि न जन्तुर्नियतो भवेत्।
नित्यं मन:समाधाने प्रयतेत विचक्षण:॥ २१॥
 
 
अनुवाद
विद्वान् पुरुष को जीवन भर पाप या पुण्य में आसक्त नहीं होना चाहिए तथा अपने मन को भगवान् में एकाग्र करने का प्रयत्न करना चाहिए । 21॥
 
A learned man should not be attached to either sin or virtue throughout his life and should try to concentrate his mind on God. 21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)