श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 287: नारदजीका गालव मुनिको श्रेयका उपदेश  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  12.287.58 
पृच्छतस्ते मया तात श्रेय एतदुदाहृतम्।
न हि शक्यं प्रधानेन श्रेय: संख्यातुमात्मन:॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
पिताजी! आपके प्रश्न के अनुसार मैंने श्रेयो के इस मार्ग का वर्णन किया है। आत्म-कल्याण का पूर्ण वर्णन नहीं किया जा सकता।
 
Father! I have described this path of Shreyo as per your question. Self-welfare cannot be fully described. 58.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)