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mahabharat 12.285.6: जैसे कछुआ अपने अंगों को फैलाता है और फिर समेट लेता है, वैसे ही सम्पूर्ण प्राणियों के शरीर आकाश आदि पंचमहाभूतों से उत्पन्न होते हैं और फिर उसी में विलीन हो जाते हैं॥6॥   |   mahabharat अध्याय 12.285: अध्यात्मज्ञानका और उसके फलका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 285: अध्यात्मज्ञानका और उसके फलका वर्णन  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  12.285.6 
प्रसारयित्वेहाङ्गानि कूर्म: संहरते यथा।
तद्वद् भूतानि भूतानामल्पीयांसि स्थवीयसाम्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
जैसे कछुआ अपने अंगों को फैलाता है और फिर समेट लेता है, वैसे ही सम्पूर्ण प्राणियों के शरीर आकाश आदि पंचमहाभूतों से उत्पन्न होते हैं और फिर उसी में विलीन हो जाते हैं॥6॥
 
Just as a tortoise stretches out its limbs and then retracts them, similarly the bodies of all living beings are born from the five great elements like sky etc. and then merge back into the same.॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)