श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 285: अध्यात्मज्ञानका और उसके फलका वर्णन  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.285.5 
तत: सृष्टानि भूतानि तानि यान्ति पुन: पुन:।
महाभूतानि भूतेभ्य ऊर्मय: सागरे यथा॥ ५॥
 
 
अनुवाद
जैसे महान् तत्त्व सूक्ष्म तत्त्वों से निकलकर उनमें ही लीन हो जाते हैं; और जैसे लहरें समुद्र से निकलकर फिर उसी में लीन हो जाती हैं, वैसे ही सम्पूर्ण जीव परमात्मा से निकलकर पुनः उसी में लीन हो जाते हैं॥5॥
 
Just as the great elements emerge from the subtle elements and merge into them; and just as the waves emerge from the ocean and then merge into it, similarly all living beings emerge from the Supreme Being and again merge into Him.॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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