Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.285.46: अज्ञानावस्था में मनुष्य अनेक प्रकार के दोषों से युक्त कर्म करता है और पूर्व में किए हुए कर्मों के लिए शोक करता है। इसके अतिरिक्त अज्ञानावस्था में वह दूसरों के द्वारा किए गए अप्रिय कर्मों को दोष के रूप में देखता है और आसक्ति आदि दोषों के कारण स्वयं भी अशुद्ध कर्म करता है। ज्ञान प्राप्त होने पर वह इन दोनों प्रकार के कर्मों को नहीं करता। ॥46॥ | mahabharat अध्याय 12.285: अध्यात्मज्ञानका और उसके फलका वर्णन । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
अज्ञानावस्था में मनुष्य अनेक प्रकार के दोषों से युक्त कर्म करता है और पूर्व में किए हुए कर्मों के लिए शोक करता है। इसके अतिरिक्त अज्ञानावस्था में वह दूसरों के द्वारा किए गए अप्रिय कर्मों को दोष के रूप में देखता है और आसक्ति आदि दोषों के कारण स्वयं भी अशुद्ध कर्म करता है। ज्ञान प्राप्त होने पर वह इन दोनों प्रकार के कर्मों को नहीं करता। ॥46॥
In the state of ignorance, man commits many deeds full of faults and he grieves for the deeds he has committed in the past. Apart from this, in the state of ignorance, he sees the unpleasant deeds done by others as faults and commits impure deeds himself due to faults like attachment etc., he does not commit these two types of deeds after attaining knowledge. ॥ 46॥
इ ति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि पाञ्चभौतिके पञ्चाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २८५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें पाञ्चभौतिक तत्त्वोंका वर्णनविषयक दो सौ पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २८५॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥