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mahabharat 12.285.39: इस प्रकार आत्मा को अभिन्न और मलों से रहित जानकर मनुष्य को शोक, हर्ष और द्वेष का त्याग करके विचरण करना चाहिए ॥39॥   |   mahabharat अध्याय 12.285: अध्यात्मज्ञानका और उसके फलका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 285: अध्यात्मज्ञानका और उसके फलका वर्णन  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  12.285.39 
एवं स्वभावमेवैतत् तद् बुद्‍ध्वा विहरेन्नर:।
अशोचन्नप्रहृष्यंश्च स वै विगतमत्सर:॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार आत्मा को अभिन्न और मलों से रहित जानकर मनुष्य को शोक, हर्ष और द्वेष का त्याग करके विचरण करना चाहिए ॥39॥
 
Thus, knowing the fact that the soul is inseparable and free from impurities, man should abandon sorrow, joy and hatred and move about. 39॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)