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mahabharat 12.285.34: बुद्धि और क्षेत्रज्ञ दोनों स्वभावतः एक दूसरे से भिन्न हैं, फिर भी वे सदैव एक ही प्रतीत होते हैं। जैसे मछली जल से भिन्न होकर भी सदैव जल से एक ही रहती है, वैसे ही बुद्धि और आत्मा भी एक दूसरे से भिन्न होकर भी अभिन्न हैं ॥ 34॥   |   mahabharat अध्याय 12.285: अध्यात्मज्ञानका और उसके फलका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 285: अध्यात्मज्ञानका और उसके फलका वर्णन  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  12.285.34 
पृथग्भूतौ प्रकृत्या तु सम्प्रयुक्तौ च सर्वदा।
यथा मत्स्योऽद्भिरन्य: स्यात् सम्प्रयुक्तो भवेत् तथा॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
बुद्धि और क्षेत्रज्ञ दोनों स्वभावतः एक दूसरे से भिन्न हैं, फिर भी वे सदैव एक ही प्रतीत होते हैं। जैसे मछली जल से भिन्न होकर भी सदैव जल से एक ही रहती है, वैसे ही बुद्धि और आत्मा भी एक दूसरे से भिन्न होकर भी अभिन्न हैं ॥ 34॥
 
Both the intellect and the knower of the field are naturally different from each other, but they always appear to be united. Just as a fish is different from the water but is always united with it, similarly the intellect and the soul are different from each other but still remain inseparable. ॥ 34॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)